Thursday, May 25, 2017

बातें- 169

शिकायतें बोहोत हैं तुमसे ..
एक ये भी की तुम शिकायत नहीं करते !


समंदर बेबसी अपनी किसी
से कह नहीं सकता;

हजारों मील तक फैला है,
फिर भी बह नहीं सकता..!


मिलावट का जमाना है साहिब .....!
कभी हमारी हां में हां भी मिला दिया करो....!


अब पिता भी नही दे सकता नसीहत जिंदगी की
इससे बेटे की जिंदगी में दखल पड़ता है ...


अब नींद से कहो हम से सुलह कर ले फ़राज़
वो दौर चला गया, जिसके लिए हम जागा करते थे


किसी की बातें बेमतलब सी
किसी की ख़ामोशियाँ क़हर हैं...
 

Monday, April 24, 2017

बातें- 168



क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता

कोई सह लेता है कोई कह लेता है 
क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता

आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हर पत्थर नही होता

क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो
इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता

कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता...

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीं तो कहीं आस्माँ नहीं मिलता

बुझा सका ह भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता

चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

Monday, April 10, 2017

बातें- 167

डरा धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो,
कहीं तलवार से भी पाँव का काँटा निकलता है ? 

"सात संदूको में बंद कर के दफ़न कर दो नफरतें,आज इंसान को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत".

कोई भूल गया है,कोई याद नही करता।मैं भी चुप हूँ,और कोई बात नहीं करता।

जरूरतें तो कभी खत्म नही होंगी।
सिर्फ सुकून ढूंढिये।

जो जितनी इज्जत के लायक उसे उतनी ही दो।रिश्ते बस रिश्ते होते हैं !कुछ इक पल के, कुछ दो पल के

जितना भी तुझे सजाऊँ ऐ ज़िन्दगीहाथों से लगाम छूटती ही जाती है....

कोशिश भी कर उम्मीद भी रख रास्ता भी चुनफिर इसके बाद थोडा मुकद्दर तलाश कर ।

मैंने इन बच्चों को बातों में लगा रक्खा हैकाश इतने में गुज़र जाए खिलौने वाला

ग़ज़ल: बशीर बद्र

खुद को इतना भी मत बचाया कर,
बारिशें हो तो भीग जाया कर।
चाँद लाकर कोई नहीं देगा,
अपने चेहरे से जगमगाया कर।
दर्द हीरा है, दर्द मोती है,
दर्द आँखों से मत बहाया कर।
काम ले कुछ हसीन होंठो से,
बातों-बातों में मुस्कुराया कर।
धूप मायूस लौट जाती है,
छत पे किसी बहाने आया कर।
कौन कहता है दिल मिलाने को,
कम-से-कम हाथ तो मिलाया कर !

Tuesday, February 14, 2017

Thursday, December 22, 2016

बातें- 164

मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब 

यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

रज़ाई वालो से ही मज़ाक करती होंगी सर्दियाँ, 

सड़को पे दिसंबर कई साल लंबा होता है

बैठा हुआ हूँ अब मैं यही सोचता हु, लोगों को मेरे होने से क्या फ़ायदा हुआ

देर तक साथ दे नहीं सकता, झूठ में बस यही ख़राबी है

तेरी चाहत तो मुक़द्दर है, मिले न मिले; राहत ज़रूर मिल जाती है, तुझे अपना सोच कर…

फायदा सबसे गिरी हुई चीज़ है, लोग उठाते ही रहते हैं..!!


Saturday, December 10, 2016

जीना इसी का नाम है...

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसीका दर्द मिल सके तो ले उधार
किसीके वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है
किसी की ...

(माना अपनी जेब से फ़कीर हैं
फिर भी यारों दिल के हम अमीर हैं ) 
मिटे जो प्यार के लिये वो ज़िन्दगी
जले बहार के लिये वो ज़िन्दगी
किसी को हो न हो हमें तो ऐतबार
जीना इसी का नाम है

(रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का 
ज़िन्दा है हमीं से नाम प्यार का ) 
के मर के भी किसी को याद आयेंगे
किसी के आँसुओं में मुस्कुरायेंगे
कहेगा फूल हर कली से बार बार
जीना इसी का नाम है

Wednesday, November 30, 2016

बातें- 163

क्या खूब तकलीफ देता हे
ख्वाव का ख्वाव रह जाना

बस ज़रा स्वाद में कड़वा है,
नहीं तो "सच" का कोई जवाब नहीं।

दर्द की बारिशों में हम अकेले ही थे,
जब बरसीं खुशियां ना जाने भीड़ कहाँ से आ गयी..

जो दूरियों में भी कायम रहा..

....वो इश्क़ ही कुछ और था।

न जाहिर हुई तुमसे, न बयान हुई हमसे।
बस सुलझी हुई आँखो मेँ, उलझी रही मोहब्बत.....


दिल सुनता नहीं है मेरी लाख कहने पर भी 
उनकी बेरुखियां भी इसे अच्छी लगती है ।


बहुत कुछ सह कर ज़िंदगी को कोसा नही हमने
बहुत सी उलझने हमने ख़ुद ही कमायी है

Wednesday, November 23, 2016

पारुल शर्मा

जब तक ये दिल तेरी ज़द में है 
तेरी यादें मेरी हद में हैं।
तुम हो मेरे केवल मेरे ही
हर एक लम्हा इस ही मद में है ।
है दिल को तेरी चाह आज भी 
ये ख्वाब ख्वाहिश-ऐ- बर में है ।
मुहब्बत इवादत है खुदा की
और मुहोब्बत उसी रब में है।

आशु...

झुका जो ली हैं गुलाबी पलकें,
शर्म से तुमने मुझे खबर है,
नजर से मिल के नजर झुकीं हैं,
जो हुआ है मुझ पर मुझे खबर है।
ये आब तेरे लवों को छूकर,
खुद को समंदर समझ रहा है,
ये दिल भी तेरी जदों में आकर,
खुद को सिकंदर समझ रहा है।
क्या तुमसे कह दें हाल खुद का,
जो हुआ है मुझ पर मुझे खबर है।
झुका जो ली हैं गुलाबी पलकें,
शर्म से तुमने मुझे खबर है............
आब :-पानी
ज़द :-निशाना

Friday, November 18, 2016

गजेंद्र कुमार

एक बूढ़े बाप को आँसू बहाते देखा है,
फिर भी उनके बेटों को चैन से सोते देखा है।
एक बूढ़े बाप को बहुत मज़बूर होते देखा है,
उनके ही बेटों को उनपर चिल्लाते देखा है।

एक बूढ़े बाप को आँसू बहाते देखा है,
बेटों से ऐसी उम्मीद नहीं थी ऐसा कहते देखा है।
सब कुछ लुटा दिया इनपर, कहकर दुखी होते देखा है,
जीने की अब चाह नहीं, कहकर फफकते हुए देखा है ।

एक बूढ़े बाप को आँसू बहाते देखा है,
सबका भला करना चाहता हूँ आज भी, पर
मेरे अब हर फैसले उनको गलत लगने लगे।
सोचा था बुढ़ापे में चैन की नींद सोऊंगा,
पर मेरे बच्चे ही मेरी नींद को भगाने लगे।

हैं यहाँ मज़बूर सब, क्या सही है, क्या गलत ?
नहीं है पहचान यहाँ।
मां-बाप की सुध कौन ले, मेरा-मेरा करने की,
लग रहा है रोग यहाँ।

आसूं भरी इन आँखों में भी,
बेटों के लिए प्यार को उमड़ते देखा है।
एक बूढ़े बाप को आँसू बहाते देखा है,
फिर भी उनके बेटों को चैन से सोते देखा है।

Wednesday, November 2, 2016

बातें-162

जी लो हर लम्हा,,बीत जाने से पहले...
लौट कर यादें आती है,,वक़्त नहीं...!

लोग तो बेवजह ही खरीदते हैं आइना,
आँखें बंद करके भी अपनी हकीकत जानी जा सकती है..

काश दर्द के भी पैर होते,
थक कर रुक तो जाते कहीं...

ज़रा सी फैली स्याही है,,,ज़रा से बिख़रे हम भी हैं,

काग़ज़ पर थोड़े लफ़्ज़ भी है छुपे हुए कुछ ग़म भी हैं,,

मुठ्ठी भर ही सही..

इश्क सभी को है...
गुनाह हमसे हो गए यूँ अनजाने मे
फूलों का कत्ल कर दिया पत्थरों को मनाने में...

धड़कनो में रहते है

दिल में ज़ख़्म देने वाले

Wednesday, October 26, 2016

बातें-161

बिलकुल बेकार नहीं हूँ मैं, 
नाकामियों की मिसाल के काम आता हूँ मैं


आओ जिंदगी को आसान करे..
थोड़ा तुम हमको समझो..
थोड़ा हम तुमको समझे..
आओ एक सौदा करे..
थोड़ा तुम बदलो, थोड़ा हम बदले..

हमें तू हर हाल मे कबूल था...
शायद यही माकूल वजह बनी
तेरे बेवफा होने की...

चुभता तो बहुत कुछ मुझको भी है तीर की तरह...!!!
मगर ख़ामोश रहता हूँ, अपनी तक़दीर की तरह...!!

किसको दिखायें दर्द यहाँ आप बोलिये ।
किसपे पड़ेगा फर्क यहाँ आप बोलिये ।।
चेहरा था कितना साफ नज़र मे अभी तलक़ ।

किसने उड़ाई गर्द यहाँ आप बोलिये ।।

Friday, October 14, 2016

बातें-160


निदा फाजली...

मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
दुःख ने दुःख से बात कि, बिन चीठी बिन तार

छोटा कर के देखिए जीवन का विस्तार
आंखों भर आकाश है, बाहों भर संसार

लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से, बाहर निकले पाँव

सब कि पूजा एक सी, अलग अलग है रीत
मस्जिद जाये मौलवी, कोयल गाए गीत

पूजा घर में मुर्ति मीरा के संग श्याम ,
जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम
नदिया सींचे खेत को, तोता कुतरे आम
सूरज ठेकेदार सा, सब को बांटे काम

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोये देर तक, भूखा रहे फकीर

अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रुप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गयी धुप

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास
पाना, खोना, खोजना साँसों का इतिहास

चाहे गीता बांचिये, या पढिये कुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान

Wednesday, September 28, 2016

गजेन्द्र...

ख़ामोश रहता है वो शख़्स जिसकी एक आवाज़ से घर में सन्नाटा छा जाता था। जिनका कोई भी फैसला घर वालों के लिए आख़िरी फैसला हुआ करता था। आज उनके फैसले का कोई कदर नहीं। उनके फैसले से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखने वाला घर का सदस्य भी मुस्कुरा कर उनके फैसले का स्वागत किया करता था। उनके फैसलों का नतीजा हीं तो है कि आज इस परिवार का समाज और गॉव में इतना नाम है, इज़्ज़त है। आज वो शख़्स बेबस है, खामोश है, उनकी कोई नहीं सुनता, उनके फैसलों पर अचानक उँगलियाँ उठनी शुरू हो गयी है, लोगों का विश्वास उनपर से उठने लगा है। ये सच हीं कहा गया है कि वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। बुढ़ापे के दहलीज़ पर आकर ये शख्स ये सोचकर कितना मन हीं मन तड़पता होगा कि जिस परिवार के ख़ातिर मैंने अपनी हज़ारों ख़्वाहिशें दफ़न की उसका नतीज़ा ऐसा हुआ।

सोचता होगा कि इस परिवार को बनाने में अपनी पुरी उम्र लगाई ताकि बुढ़ापे में सुकून और चैन की ज़िंदगी बिताएंगे। इन्होने परिवार रुपी मज़बूत पेड़ इसलिए लगाया था कि बाद में उन्हें छाया देगा पर इन्हें कहां मालूम था की इन पेड़ों को उनकी छाया की आदत पड़ जाएगी। विडंबना ये है कि लोग आज भी इस बूढ़े बरगद के पेड़ को सहारा देने के बजाय इनसे सहारा और छाँव मांगते हैं। कुछ लोग ये भी तोहमत लगाते हैं कि मुझे छाँव कम दिया। उनकी इन बातों पर ये विशाल बूढ़ा बरगद का पेड़ मंद-मंद मुस्कुराता है, ये सोचकर कि मैंने तो अपनी टहनियां फैलाकर हर किसी को बस छाँव देने की कोशिश की, खुद को धुप में जलाकर, बिना किसी स्वार्थ के, कोई ज्यादा छाँव ले गया तो इसमें मेरा क्या कसूर? किसी को ज्यादा छाँव देने से मुझे क्या फायदा? बरगद का पेड़ मायूस होता है आज भी उनकी मांग पर, पर जितना हो सकता है आज भी उनके लिए कर रहा है, आखिर उनसे प्यार जो करता है, पर बरगद को उनके प्यार से भरोसा उठता जा रहा है... दिल को तस्सली देता रहता है इस बात से कि प्यार देने का नाम है लेने का नहीं !!!

अहमद फ़राज़

सुना है रब्त है .. उस को .. ख़राब-हालों से...
सो अपने आप को ... बर्बाद कर के देखते हैं ;

सुना है बोले तो .. बातों से.. फूल झरते हैं...
ये बात है तो .. चलो बात.. कर के देखते हैं ;

सुना है रात उसे ... चाँद तकता रहता है... 
सितारे.. बाम-ए-फलक से .. उतर के देखते हैं ;

सुना है हश्र में .. उस की .. ग़ज़ल सी आंखें...
सुना है उसको हिरन .. दश्त भर के देखते हैं ;

सुना है दिन को .. उसे तितलियाँ सताती हैं...
सुना है रात को .. जुगनू ठहर के .. देखते हैं ;

अब उस के शहर में.. ठहरें.. के कूच कर जायें...
'फ़राज़' आओ ... सितारे सफ़र के.. देखते हैं...."

Tuesday, September 27, 2016

बातें-159

यही मंज़र तो .. मुहब्बत को .. उबाल देता है...
डूबने वालों को .. ' वो ' ऊपर .. उछाल देता है...."

मुकाम वो चाहिए कि.... जिस दिन भी हारु ,
उस दिन जीतने वाले से ज्यादा मेरे चर्चे हो

राम की बस्ती में जब दंगा होता है
हिन्दू-मुस्लिम सब रावन हो जाते हैं ___

शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाये, तो अब मिलने का गम होगा ______

उस शख़्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया ।

Sunday, September 25, 2016

बातें-158

न कोई दर्द होता
साथ पूरा जहान होता
गर हम भी चालाक होते
जीना कितना आसान होता
सच्चाई गयी भाड़ में
झूठ हमारी पहचान होता
गर हम भी चालाक होते
जीना कितना आसान होता
बेईमानी की ईंट होती
आलिशान मेरा मकान होता
गर हम भी चालाक होते
जीना कितना आसान होता
नैतिकता को भूल जाती
पैसा मेरा भगवान होता
गर हम भी चालाक होते
जीना कितना आसान होता

Thursday, September 1, 2016

बातें-157

यूँ असर डाला है मतलब-परस्ती ने दुनियाँ पर कि... 
हाल भी पूछो तो लोग समझते हैं, कोई काम होगा...!!!

हर एक बात के यूँ तो दिए जवाब उस ने
जो ख़ास बात थी हर बार हँस के टाल गया..


जिस दिन "सादगी" श्रंगार हो जाएगी
'आईनों' की हार हो जाएगी.....!!


कुछ न कुछ रोज़ फेंकना पड़ता है
हसरतों के कबाड़ .खाने मे....


हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना ना कहो,
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो..............राहत इन्दौरी

हर एक बात के यूँ तो दिए जवाब उस ने
जो ख़ास बात थी हर बार हँस के टाल गया..

Thursday, August 4, 2016

बातें-156

बेशक मैं तुझे प्यार करता हूँ 
पर मनाने का मुझमें हुनर नहीं ||
लापरवाह हूँ मगर ऐसा नहीं 
कि मुझको तेरी फिकर नहीं ||


कितनी मासूम होती है ये दिल की धड़कनें..!
कोई सुने ना सुने...ये खामोश नही रहती..!!


सम्भल के रहना ऐसे लोगों से,,,
जिन के दिल मे भी दिमाग होता है!!


कोई सुलह करा दे अब जिंदगी की उलझनों से...
बड़ी तलब लगी है आज मुस्कुराने की...


ज़ुबा उनकी लाख झूठ कहती रही हमसे,
फिर यूँ हुआ कि हमने उनकी आँखें देख ली!

बातें-155

बेशक मैं तुझे प्यार करता हूँ 
पर मनाने का मुझमें हुनर नहीं ||
लापरवाह हूँ मगर ऐसा नहीं 
कि मुझको तेरी फिकर नहीं ||


सम्भल के रहना ऐसे लोगों से,,,
जिन के दिल मे भी दिमाग होता है!!


कोई सुलह करा दे अब जिंदगी की उलझनों से...
बड़ी तलब लगी है आज मुस्कुराने की...


मौत उसकी जिसका ज़माना करे अफ़सोस
यूं तो सभी आये हैं दुनिया में मरने के लिए


ज़वाब ही तो होता है यारो..!!
खतों का कोई ज़वाब न आना..!


उम्र जाया कर दी औरों के वजूद में नुक़्स निकालते निकालते !!
इतना खुद को तराशते तो खुदा हो जाते...!

लोग आँसुओं मे पढ़ते थे नाम तेरा..
इसीलिए हमने रोना छोड़ दिया..

रूठे लोगों को मनाने में मज़ा आता है !!
जान कर आप को नाराज़ किया है मैंने !!

Tuesday, July 5, 2016

बातें-154

मौक़ा जिसे भी मिलता है पीता ज़रूर है,
शायद बहुत मिठास हमारे लहू में है !

आरजू है,बेखुदी है,बेबसी है,बंदगी है,
हाँ यही तो,जिंदगी है,जिंदगी है,जिंदगी है,


मेरी अल्फाज़ो पे अब मेरा अख़्तियार कहाँ !!
जब से देखा है तेरा चाँद सा चेहरा !!


अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया 
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया


ज़िंदा रहने का कुछ ऐसा अन्दाज़ रखो..
जो तुमको ना समझे उन्हें नज़रंदाज रखो"..

तुम्हें देखूँ रोज करीब से,
मेरे शौक हैं कितने अजीब से..

हक़ आपको है, रूला लें जब भी जी चाहे ...
मगर मेरी भी ख्वाहिश है कभी बहला लिया करिये...

आगे किसी फसाने में क़ैद लिखेगा मुझे 
वो देखता है अब मेरे क़िरदार बहुत हैं

Wednesday, June 29, 2016

बातें-153

कहाँ पर बोलना है और कहाँ पर बोल जाते हैं
जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं...
कटा जब शीश सैनिक का तो हम खामोश रहते हैं
कटा एक सीन पिक्चर का तो सारे बोल जाते हैं...
ये कुर्सी मुल्क खा जाए तो कोई कुछ नहीं कहता
मगर रोटी की चोरी हो तो सारे बोल जाते हैं...
नयी नस्लों के ये बच्चे जमाने भर की सुनते हैं
मगर माँ बाप कुछ बोले तो बच्चे बोल जाते हैं...
फसल बर्बाद होती है तो कोई कुछ नहीं कहता
किसी की भैंस चोरी हो तो सारे बोल जाते हैं...
बहुत ऊँची दुकानों में कटाते जेब सब अपनी
मगर मजदूर माँगेगा तो सिक्के बोल जाते हैं...
गरीबों के घरों की बेटियाँ अब तक कुँवारी हैं
कि रिश्ता कैसे होगा जबकि गहने बोल जाते हैं...
अगर मखमल करे गलती तो कोई कुछ नहीं कहता
फटी चादर की गलती हो तो सारे बोल जाते हैं...
हवाओं की तबाही को सभी चुपचाप सहते हैं
च़रागों से हुई गलती तो सारे बोल जाते हैं...
बनाते फिरते हैं रिश्ते जमाने भर से हम अक्सर
मगर घर मे जरूरत हो तो रिश्ते बोल जाते हैं...

Sunday, June 12, 2016

आधुनिक सच....सोचना कि बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो या विदेश की सेवा के लिए....

मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं,
तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं,
सुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं,
रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं।
अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं,
अकेले रह कर वह कैरियर बनाते हैं,
कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं,
भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं,
मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं,
अपने नन्हे मुन्ने को पाल नहीं पाते हैं,
फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते हैं,
उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते हैं।
परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है,
केवल 'आया आंटी' को ही पहचानता है,
दादा -दादी, नाना-नानी कौन होते है?
अनजान है सबसे किसी को न मानता है।
आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है,
टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है,
यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती है,
छुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है।
नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है,
जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है,
उसे सुलाने में अक्सर वो भी सो जाती है,
कभी जब मचलता है तो टीवी दिखाती है।
जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है,
देसी खाना छोड़ कर पीजा बर्गर खाता है,
वीक ऐन्ड पर मौल में पिकनिक मनाता है,
संडे की छुट्टी मौम-डैड के संग बिताता है।
वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है,
वह स्कूल से निकल कर कालेज में आता है,
कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है,
आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है।
वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है,
मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है,
धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है,
मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है।
कुछ दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है,
जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है,
माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है,
बेटे के दिमाग में भी कैरियर ही रह जाता है।
बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं,
जिसकी अनदेखी की अब उनसे आँखें चुराते हैं,
क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं,
घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं।
हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं,
दाढ़- दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं,
कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं,
वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं।

बेटा एडिलेड में, बेटी है न्यूयार्क।
ब्राईट बच्चों के लिए, हुआ बुढ़ापा डार्क।
बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार,
चिता जलाने बाप की, गए पड़ोसी चार।
ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार,
दुनियां छोटी हो गई, रिश्ते हैं बीमार।
बूढ़ा-बूढ़ी आँख में, भरते खारा नीर।
हरिद्वार के घाट की, सिडनी में तकदीर।

Thursday, May 19, 2016

रामप्रकाश 'बेखुद' लखनवी

दोस्ती ने छीन ली, कुछ दुश्मनी ने छीन ली
थोड़ी-थोड़ी ज़िन्दगी मुझसे सभी ने छीन ली ।
अपना दुश्मन मैं अँधेरे को समझता था मगर
मेरी बीनाई तो मुझसे रोशनी ने छीन ली ।
आजकल गमलो मे पौधे उग रहे हैं हर तरफ़
इनके हिस्से की ज़मीं भी आदमी ने छीन ली ।
क्या गिला, कैसी शिकायत, कैसा ग़म, अफ़्सोस क्या
ज़िन्दगी जिसने अता की थी, उसी ने छीन ली ।
जान जानी थी गई, ’बेख़ुद’अब इससे क्या गरज़
तुमने ख़ुद दे दी किसी को या किसी ने छीन ली ।

दानिश क़मर...

वो मुझको आज़माना चाहता है..
खुद अपना दिल दुखाना चाहता है..
.
वो मुझको हंस के देखे जा रहा है..
कोई उलझन बढाना चाहता है..
.
वो रो देता है सुनकर ग़म किसी के..
किसी का ग़म उठाना चाहता है..
.
ये देखो आंख झिलमिल हो रही है..
कोई चेहरा उभरना चाहता है..
.
जो मेरा मेहरवां बरसो रहा है..
वो अब एहसां जताना चाहता है..
.
गले लग के उसी के रो रहे हैं..
जो नश्तर सा चुभोना चाहता है..
.....

Friday, May 13, 2016

बातें-152

अक्ल वालों के मुकद्दर में ये जुनून कहाँ ग़ालिब 
ये इश्क़ वालें है जो हर चीज़ लूटा देते हैं !!!

एक जैसी ही दिखती थी माचिस की वो तीलियाँ.
“कुछ ने दिये जलाये”…”और कुछ ने घर.”.


मेरे बारे में कोई राय मत बनाना....
मेरा वक़्त भी बदलेगा, तुम्हारी राय भी ! 

तुम बेशक आईना देखो
पर आईने में मुझको देखो...

"चाँदी उगने लगी हैं बालों में 
उम्र तुम पर हसीन लगती है"



"टपकती है निगाहों से, बरसती है अदाओं से,
कौन कहता है मोहब्बत पहचानी नहीं जाती"..!!

बे -जान तो मै अब भी नहीं फ़राज़..
मगर जिसे जान कहते थे वो छोड़ गया..

एहतियातन बुझा सा रहता हूँ
जलता रहता तो राख हो जाता।

Sunday, May 8, 2016

अलग है....

अलग है
शहर ये कुछ अलग है, 
लोग भी कुछ यहा अलग है, 
मैं भी पहले जैसा कहाँ रहा, 
आज सोच मेरे भी अलग है,
एक ही पौधे मे पनप्ते है पर,
फुलो की फितरत कांटो से अलग है,
धुंढो तो हर चेहरे पर दर्द है,
बस दर्द कि वजह कुछ अलग है,
जो कल थे दोस्त वो आज भी है,
बस दोस्ती के मायने अलग है

माँ....

ज़िंदगी को ज़िन्दगी देते देखा
जब आँख खोलीं माँ को देखा
लफ़्ज़ को लफ़्ज़ बनते देखा
जब बोलना सीखा माँ को देखा
क़ायनात की पूरी ख़ुशी उनको ही थी
जब चलना सीखा तो माँ को ही देखा
बुराई मेरे पास तक से निकल जाती है
पता है मुझे उसकी दुआएँरोक देती है
रोज़ तो सबको मुकम्मल ही है काम
छुट्टी वाले दिन भी माँ को काम पे देखा
देर रात घर पंहुचा तो उसे तस्सली हुई
फिर खाना देती है माँ और सोती है माँ
कभी रूपया तो कभी आठाना दिया
माँ के पास जो भी था सारा दिया

Tuesday, April 19, 2016

बातें-151

खतों से मीलों सफर करते थे जजबात कभी
अब घंटों बातें कर के भी दिल नही मिलते.....

आज "फ़िर" बहुत "खमोशी" से "गुज़र" गया,
मेरे "गाल" पर से "आँसू".....
"मगर"..... "दिल" की "गहराइ" मे "अपनी",
एक "चीख" सी "छोड़" गया....


समा बाँधा हे हिचकियों ने आज कुछ यूँ
खबर दे रही हो जैसे "कोई याद करता है..

गुज़र जायेगा ये दौर भी
ज़रा इत्मीनान तो रख 
जब ख़ुशी ही न ठहरी
तो ग़म की क्या औकात !

दरख्तों में उदासी छा गई शाखों ने पत्ते छोड़ दिये,
जरा सी मुफलिसी क्या आ गई,अपनों ने रिश्ते तोड़ दिये,

ये अलग बात है कि दिखाई न दे मगर शामिल जरूर होता है,
खुदकुशी करने वाले का कोई न कोई कातिल जरूर होता है।

मेरी गली से गुजरा, घर तक नहीं आया,
अच्छा वक्त भी करीबी रिश्तेदार निकला"..!!

Thursday, April 14, 2016

बातें-150

एक तेरे चेहरे के सिवा कोई चेहरा अच्छा नहीं लगता,
उफ़ ये कोई इश्क़ है या कोई मर्ज़ कि कुछ अच्छा नहीं लगता...

वास्ता नही रखना .. तो फिर मुझपे .. नजर क्यूं रखती है??
मैं किस हाल में जिंदा हूँ .. तू ये सब .. खबर क्यूं रखती है..!!

यादों की पुरवाई आज फिर चल रही है ...
चेहरें पे ख़ुशी आँखों में नमी चल रही है.....
किसको फुरसत है हुनर देखे तुम्हारा
खुली सडक पे तमाशे हों तो लोग रुक ही जाते हैं
कुछ बातों के मतलब हैं और कुछ मतलब की बातें
जब से ये फर्क जाना, जिंदगी आसान बहुत हो गई

ज़िंदगी तो बचपन में था....
आज तो बस साँसे चल रही है ......

गॉव में कुछ नहीं है, मगर सुकून तो है..,...
शहर में तो बस ज़रूरते चल रही है......
होंगे आप बहुत खूबसूरत मगर......
दिल में मेरे तो बस गॉव वाली चल रही है....

इक यही दस्तूर...... इश्क़ में कायम रखना 
शब्द रूठ जाएँ ...तो ख़ामोशी से मना लेना

Sunday, April 10, 2016

"माँ"....

लेती नहीं दवाई "माँ",
जोड़े पाई-पाई "माँ"।
दुःख थे पर्वत, राई "माँ",
हारी नहीं लड़ाई "माँ"।
इस दुनियां में सब मैले हैं,
किस दुनियां से आई "माँ"।
दुनिया के सब रिश्ते ठंडे,
गरमागर्म रजाई "माँ" ।
जब भी कोई रिश्ता उधड़े,
करती है तुरपाई "माँ" ।
बाबू जी तनख़ा लाये बस,
लेकिन बरक़त लाई "माँ"।
बाबूजी थे सख्त मगर ,
माखन और मलाई "माँ"।
बाबूजी के पाँव दबा कर
सब तीरथ हो आई "माँ"।
नाम सभी हैं गुड़ से मीठे,
मां जी, मैया, माई, "माँ" ।
सभी साड़ियाँ छीज गई थीं,
मगर नहीं कह पाई "माँ" ।
घर में चूल्हे मत बाँटो रे,
देती रही दुहाई "माँ"।
बाबूजी बीमार पड़े जब,
साथ-साथ मुरझाई "माँ" ।
रोती है लेकिन छुप-छुप कर,
बड़े सब्र की जाई "माँ"।
लड़ते-लड़ते, सहते-सहते,
रह गई एक तिहाई "माँ" ।
बेटी रहे ससुराल में खुश,
सब ज़ेवर दे आई "माँ"।
"माँ" से घर, घर लगता है,
घर में घुली, समाई "माँ" ।
बेटे की कुर्सी है ऊँची,
पर उसकी ऊँचाई "माँ" ।
दर्द बड़ा हो या छोटा हो,
याद हमेशा आई "माँ"।
घर के शगुन सभी "माँ" से,
है घर की शहनाई "माँ"।
सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई "माँ"